NTPC : भारत इस समय कुल इंस्टॉल्ड पावर कैपेसिटी में करीब 1.7% बिजली परमाणु ऊर्जा से बनाता है और लक्ष्य है कि 2047 तक इसे 100 गीगावॉट तक पहुंचाया जाए, जिसके लिए सरकार ने बजट और नीतियों दोनों स्तर पर तेज तैयारी शुरू कर दी है
न्यूक्लियर एनर्जी मिशन और 20,000 करोड़ PLI
सरकार ने न्यूक्लियर एनर्जी को दीर्घकालिक क्लीन एनर्जी पिलर बनाते हुए 2047 तक 100 GW की रोडमैप डॉक्युमेंट और न्यूक्लियर एनर्जी मिशन घोषित किया है। मौजूदा समय में लगभग 8,880 मेगावाट की परमाणु क्षमता चल रही है, जबकि 6,600 मेगावाट निर्माणाधीन और करीब 8,000 मेगावाट प्लानिंग स्टेज में है, यानी आने वाले वर्षों में कुल क्षमता लगभग 23,480 मेगावाट तक पहुंच सकती है। इस गैप को भरने के लिए सरकार प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव के तहत करीब 20,000 करोड़ रुपये तक की मदद, 2035 तक न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल होने वाले कई इम्पोर्टेड उपकरणों पर टैक्स छूट और 2026 के बजट में परमाणु विभाग के लिए 24,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का प्रावधान कर चुकी है
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SHANTI बिल, प्राइवेट पार्टिसिपेशन और NTPC से आगे की कहानी
नई नीति के तहत SHANTI बिल जैसे कदमों से प्राइवेट कंपनियों की भागीदारी आसान हुई है और सप्लायर्स की लायबिलिटी लिमिट तय होने से टेक्नॉलजी कंपनियों का भरोसा बढ़ा है। सरकार ने साफ संकेत दिया है कि 2047 तक होने वाली 100 GW न्यूक्लियर क्षमता का एक बड़ा हिस्सा पब्लिक सेक्टर NTPC और उसके साथ भागीदारी करने वाली प्राइवेट कंपनियों के जरिए तैयार होगा, लेकिन सप्लाई चेन में कई मिड और स्मॉल कैप प्लेयर्स को भी बड़ा स्कोप मिलेगा। इसी वजह से अब फोकस सिर्फ NTPC जैसे बड़े नामों पर नहीं, बल्कि उन तीन इंजीनियरिंग कंपनियों पर भी है जो रिएक्टर इक्विपमेंट, सिविल कंस्ट्रक्शन और टरबाइन पार्ट्स में पहले से मजबूत पकड़ रखती हैं।
MTAR टेक: रिएक्टर इक्विपमेंट का सटीक खिलाड़ी
MTAR टेक पिछले चार दशकों से भारत के न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए फ्यूल लोडिंग मशीन, कूलिंग सिस्टम और अन्य क्रिटिकल कम्पोनेंट सप्लाई कर रही है। कंपनी के मैनेजमेंट के मुताबिक एक 700 मेगावॉट के रिएक्टर से उसे लगभग 350–400 करोड़ रुपये तक का बिजनेस मिल सकता है और हाल में काइगा यूनिट 5 और 6 के लिए उसे 500 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर मिले हैं, जिनकी डिलीवरी 2030 तक स्टेप-वाइज होनी है। वैल्यूएशन के लिहाज से MTAR का EV/EBITDA लगभग 67.8 है जबकि इंडस्ट्री एवरेज करीब 64 के आसपास है और कंपनी 10.5% के करीब रिटर्न ऑन कैपिटल एंप्लॉयड दिखा रही है, जो हाई टेक लेकिन कैपिटल इंटेंसिव बिजनेस मॉडल को दर्शाता है।
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HCC: न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स की सिविल बैकबोन
Hindustan Construction Company ने राजस्थान, कूडनकुलम, काकरापार और नारोरा जैसे प्रमुख न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स में सिविल कंस्ट्रक्शन का काम किया है और फिलहाल कलपक्कम में फास्ट रिएक्टर फ्यूल साइकिल फैसिलिटी बना रही है। कंपनी के पास करीब 40,000 करोड़ रुपये की बिड पाइपलाइन है, जिसमें से लगभग 15–20% काम न्यूक्लियर और हाइड्रो से जुड़ा हो सकता है, यानी आने वाले वर्षों में प्रोजेक्ट फ्लो स्थिर रहने की संभावना बढ़ती है। फाइनेंशियल मेट्रिक्स में HCC का EV/EBITDA 9.2 के आसपास है, ROCE 25.2% है जबकि ROE हल्का नेगेटिव है, जो हाई डेट और पुराने प्रोजेक्ट्स की सफाई प्रक्रिया की वजह से दबाव को दिखाता है
Azad Engineering: ग्लोबल टरबाइन पार्ट्स से न्यूक्लियर प्ले
Azad Engineering हाई प्रिसिजन टरबाइन एयरफॉइल और जटिल पार्ट्स बनाती है, जिनका इस्तेमाल न्यूक्लियर, इंडस्ट्रियल और थर्मल पावर टरबाइनों में होता है। कंपनी ने GE Vernova के साथ करीब 53.5 मिलियन डॉलर (लगभग 400+ करोड़ रुपये) का लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है, जिसके तहत 2030 तक न्यूक्लियर और अन्य पावर सेगमेंट के लिए क्रिटिकल एयरफॉइल सप्लाई किए जाएंगे और इसके लिए 7,600 वर्ग मीटर का डेडिकेटेड मैन्युफैक्चरिंग प्लांट भी खड़ा किया गया है। वैल्यूएशन के स्तर पर Azad का EV/EBITDA लगभग 43.8 है, ROCE 12.2% और ROE 8.9% के आसपास है, जो यह दिखाता है कि कंपनी ग्रोथ फेज में है और ग्लोबल न्यूक्लियर सप्लाई चेन में अपनी जगह मजबूत कर रही है
Disclaimer : इस लेख में दी गई जानकारी केवल शैक्षिक और जनरल इनफॉर्मेशन के उद्देश्य से तैयार की गई है, इसे किसी भी तरह की निवेश या ट्रेडिंग सलाह नहीं माना जाए।







